राजभाषा हिंदी के प्रयोग की व्यवहारिक समस्याएः एक पुनर्विचार

आजादी की लड़ाई में हमारे बहुभाषा-भाषी देश को एकजुट करने में हिंदी का महत्वपूर्ण योगदान था । हिंदी ने लोगों के आपसी भेदभाव और तमाम गतिरोधों को दूर कर देश के जन-जन को राष्ट्रप्रेम के एकसूत्र में बांधने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी की इसी ऐतिहासिक भूमिका और इसकी भविष्योन्मिखी संभावनाओं को लक्ष्य करके देश की संविधान सभा ने इसे राजभाषा के गरिमामय पद पर बिठाया और देश की समन्वयपरक और समावेशी संस्कृति के संरक्षण की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी । भारतीय भाषाओं के हक में यह एक बड़ी दूरदर्शी एवं उददेश्यपूर्ण पहल थी लेकिन राजभाषा के प्रश्न पर सभी की राय का सम्मान और समावेश करने के फेर में एक अनहोनी ये हो गई कि जिस अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ी गई, आजादी के बाद उसी अंग्रेजी शासन-प्रशासन की भाषा सह राजभाषा के तमगे के साथ अगले 15 साल का पट्टा लेकर सरकारी दफ्तरों में फिर से काबिज हो गई नतीजा जो हुआ उसे हम-आप बार-बार अफसोस के साथ दोहराते हैं कि अंग्रेज तो गए लेकिन अंग्रेजी छोड गए ___ मैकाले ने अपनी एकेडमिक प्रयोगशाला में भारत की पीढ़ियों पर जेनेटिक इंजीनियरिंग का जो कमाल दिखाया था, उसे आजादी के बाद शायद सुधारा जा सकता था पर एक अंग्रेजी चाल ने अपनी भाषाओं को अपने ही गलियारों में बेगाना और बेमानी बना दिया । आज स्थिति ये है कि तमाम निगम-दफ्तर अपने साइनबोर्डों पर तो हिंदी का स्वागत करते हैं, पर ऊपर से


कार्यालयों में हिंदी के प्रयोग और व्यवहार की दयनीय स्थिति के पीछे कारणों और तर्कों की लंबी सूची है । कहीं शब्दकोश और अभिव्यक्तियों अपर्याप्त होने की मजबूरी है तो कहीं उनकी कठिनाई, जटिलता और संदिग्धता का हवाला । अपनी भाषा के कुछ शब्द कभी हमें असहज लगते हैं तो कभी अटपटे । फिर कहा जाता है कि छोडिए साहब जैसा चलता है चलने दीजिए इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि देश के संविधान ने जिस भाषा को राजभाषा का दर्जा दिया उसे संविधान के संरक्षक न्यायालय ही अपने काम-काज की भाषा के रूप में अपनाने को तैयार नहीं । आज भी देश के सप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की कार्यवाही अंग्रेजी में होती है हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं लिखे दस्तावेजों, आरोप पत्रों, प्रार्थना पत्रों और सबूतों पर सीधे कोई कार्यवाही नहीं की जाती न्यायालय तमाम सूचनाओं को वर्नाकुलर्स से पहले अंग्रेजी प्रोसेक करते है, फिर सारी बहस, दलीलें अंग्रेजी में सुनते हैं और अंततः फैसले भी अंग्रेजी में ही सनाते हैं । हिंदी के प्रयोग को लेकर हीनता और उदासीनता का ऐसा भाव यदि देश के न्याय मंदिरों में भी पैर पसारे हुए हो तो फिर मातभाषा के न्याय की गहार और कहां लगाई जाएगी ? राजभाषा हिंदी के विकास के लिए केंद्र सरकार द्वारा करोड़ों रुपए खर्च किए गए । कई विभागों की स्थापना की गई । उन विभागों के तहत सरकारी कार्यालयों के उपयोग हेतु तरह-तरह की सामग्री और प्रादर्श तैयार किए गए कर्मचारियों के शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की गई लेकिन इस दिशा अर्पे क्षत सफलता अभी तक नहीं मिली । हो सकता है कि राजभाषा कार्यान्वयन की नियोजित प्रक्रिया के तहत निर्मित या उत्पादित सामग्री कुछ मात्रा में बनावटी, दुरूह या अपूर्ण हो जिसकी वजह से कर्मचारियों को हिंदी में टिप्पण-आलेखन के बजाए अंग्रजी में नोटिंग-ड्राफ्टिंग करना ज्यादा सुविधाजनक लगता है लेकिन सारी सामग्री बेकार है सारी प्रक्रियाएं निरर्थक हैं, और सारे नियम जबरदस्ती हैं- यह मानकर बैठ रहना भी अतिवादिता ही कही जाएगी । कोई भी काम कठिन लगने के दो कारण होते हैं । पहला यह कि तमाम प्रयास करने के बावजूद वह काम सचमुच कठिन है । दूसरा यह कि उसको पूर्वधारणा के तौर पर ही कठिन मान लिया गया और उसे आसान बनाने की कोशिश नहीं की गई सरकारी दफ्तरों में राजभाषा हिंदी के प्रयोग को लेकर यदि गहराई से विचार करें तो दूसरा कारण ही ज्यादा सही जान पड़ता है आज कार्यालयी हिंदी में कामकाज इसलिए कठिन है क्योंकि इसको वास्तविक व्यवहार में नहीं लाया जाता है इसका प्रयोग केवल राजभाषा-नियमों के डंडे से बचने के लिए या फिर राजभाषा-पुरस्कार पाने के लिए ही किया जाता है । यह तथ्य सर्वविदित और स्वतःप्रमाणित है कि भाषा व्यवहार से सीखी जाती है और वास्तविक व्यवहार के जरिए ही चलती और बढ़ती है राजधानी दिल्ली में मैट्रो ट्रेन सेवा शुरू होने के बाद विश्वविद्यालय केंद्रीय सचिवालय आदर्श नगर जैसे तमाम शब्द एक बार फिर से व्यवहार में आकर उसकी रफ्तार से कदम मिलाते हुए दौड़ रहे हैं । इसके पीछे मूल कारण रोजमर्रा की जिंदगी में होने वाला इनका वास्तविक व्यवहार है इनको देखने, सुनने, पढ़ने की फ्रीक्वेंसी में हुई बढ़ोत्तरी है यही बात राजभाषा हिंदी के संदर्भ में भी लागू होती है राजभाषा हिंदी और जनभाषा हिंदी में आपस में तालमेल और बोधगम्यता होना एक गुणात्मक स्थिति अवश्य है लेकिन हमेशा और हर जगह ये एकरूप हो जाएं, ऐसा हो पाना न तो सिद्धांत रूप में अनिवार्य है और न व्यवहारिक तौर पर संभव । राज-काज और शासन-संचालन में व्यवस्था और प्रयोक्ता दो पक्ष होते हैं और दोनों पक्षों की कुछ भाषागत अपेक्षाएं एवं मर्यादाएं रहती हैं राजभाषा हिंदी के विशिष्ट स्वरूप को भी इसी संदर्भ में देखना और पहचानना चाहिए सुस्पष्टता, सक्षप्तता, संप्रेषणीयता आदि बातों का ध्यान में रखते हुए जिस प्रकार की शैली का प्रयोग सरकारी कामकाज में किया जाता है वह निश्चित तौर पर कुछ प्रशिक्षण पर समान रूप से लागू होती है । राजभाषा हिंदी के प्रयोग में दक्षता हासिल करने के लिए कुछ हद तक आरंभिक प्रशिक्षण की जरूरत होती है पर उसके आगे का रास्ता तो वास्तविक स्थितियों में किए गए प्रयोग और व्यवहार से ही खुलता है । इसलिए कर्मचारियों का यह तर्क बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं हो सकता कि सरकारी कामकाज हिंदी में करना बहुत कठिन है क्योंकि इसकी शब्दावली, शैली, विन्यास आदि कठिन हैं । वास्तव में इस कठिनाई का बड़ा कारण भाषा की कठिनाई न होकर उसका प्रयोग न किया जाना ही है । एक सबसे बड़ी समस्या सत्ता और प्रशासन के प्रतिष्ठानों में बैठे अधिकारियों और कार्मिकों की पद-प्रतिष्ठा और इससे जुड़ी मनो-सामाजिक दृष्टि की है । अनेक अधिकारियों कर्मचारियों को कार्यालय या समाज में हिंदी प्रयोग करने पर अपने अंग्रेजी ज्ञान पर प्रश्नचिह्न सा लगता नजर आता है और यह स्थिति उन्हें हरगिज बर्दाश्त नहीं उन्हें लगता है कि हिंदी के प्रयोग करने से लोगों को यह लगेगा कि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती । अच्छी हिंदी जानते हुए भी अनभिज्ञ दिखाई पड़ना और अच्छी अंग्रेजी न जानते हुए भी अंग्रेजीदां दिखाई देते रहने की यह मानसिकता हमारे सत्ता-समाज में बहुत गहराई से लोगों के दिलों दिमाग पर हावी है । यह अंग्रजों द्वारा दी गई एक प्रकार की मानसिक गुलामी है और यह एक बहुत बड़ा सच है कि मानसिक रूप से गुलाम व्यक्ति सफल दिख तो सकता है लेकिन सफल हो नहीं सकता । इसलिए हेहिचक कहा जा सकता है कि अपनी भाषा और राजभाषा की उपेक्षा करके हम सफल होते नहीं होते, केवल सफलता का ढोंग ही करते हैं । सरकारी कार्यालयों में हिंदी के प्रयोग के नाम पर केवल कुछ चीजें ही दिखाई पड़ती है जैसे कार्यालयों ने अपने यहां द्विभाषी नामपट्ट, रबर की मुहरें, कुछ हिंदी सॉफ्टवेयर खरीद रखे हैं और दीवारों पर यहां-वहां हिंदी भाषा प्रेम दर्शाते महापुरुषों के उद्धरण चिपकाकर हिंदी के प्रयोग का निर्धारित कोटा पूरा कर लिया जाता है । कार्यालयी हिंदी का न तो उनको ज्ञान होता है और न ही उसका इस्तेमाल करने की इच्छा रखते हैं । यह सच है कि कार्यालयी हिंदी का मौजूदा स्वरूप जिस रूप में अब विकसित हो गया है, वह हमें उसके प्रयोग और व्यवहार के प्रति आश्वस्त होने का मौका नहीं देता लेकिन यह भी सच है कि राजभाषा हिंदी का यह रूप उसकी मौलिक प्रकृति में बहत रचा-बसा नहीं है पहले कामकाज की भाषा अंग्रेजी थी लेकिन जब हिंदी के प्रयोग की बात आई तो पारिभाषिक शब्दावली निर्माण की प्रक्रिया में बहुत से शब्दों, पदों, अभिव्यक्तियों के ऐसे जटिल हिंदी समतुल्य शब्द निर्धारित कर दिए गए जो या तो हिंदी की प्रकृति के अनुकूल नहीं थे या अंग्रेजी भाषा से लिटरली अनूदित होने के कारण अटपटे और असामान्य लगते थे । उदाहरण के लिए, कुछ पद जैसेः हस्ताक्षरार्थ, अनुमोदनार्थ प्रति अग्रेषित करें के बजाए हस्ताक्षर के लिए अनुमोदन के लिए प्रति आगे भेजें जैसे सामान्य विकल्पों के चयन से इस तरह की भाषागत कठिनाई से निपटा जा सकता है इसके लिए न तो तकनीकी शब्दावली आयोग का कोई दुराग्रह होता न राजभाषा की बाध्यता, बल्कि सच तो यह है कि हिंदी के लिए विविध क्षेत्रों में कार्य कर रही कई संस्थाओं ऐर स्वयंसेतवी विद्वानों द्वारा इस तरह के प्रयोग पहले भी किए गए हैं पुराने शब्दकोशों और शब्दावलियों में सुधार और संवर्धन के काम किए गए हैं और समयानुकूल नए सुझाव भी प्रस्तुत किए गए हैं । ___भारत सरकार के राजभाषा के विभाग के मौजूरा निर्देशों के तहत जहां तक संभव हो हिंदी के सरल शब्दों और अभिव्यक्तियों को अपनाने की सलाह दी गई है । हिंदीतर एवं विदेशी भाषाओं के शब्द जो हिंदी भाषा में घुल-मिल गए हैं उन्हें शामिल करते हुए व्यवहारिक हगिंदी के प्रयोग पर बल दिया गया है लेकिन अगर अब भी हिंदी के प्रयोग को लेकर कोई अभाव-कुभाव दिखाई पड़ता है तो यह राजभाषा हिंदी की कठिनाई या मजबूरी नहीं बल्कि उसके प्रति हमारी बेवफाई ही होगी । अंत में सवाल यही है कि क्या हम राजभाषा की जहां है -जैसी है वाली अब तक चली आ रही नियति और अपनी नीयत को चुपचाप स्वीकार कर दिन काटने और नौकरी गुजारने के लिए तैयार हैं या अपने छोटे-छोटे प्रयासों से इन हालात को बदलने की कोशिश करना चाहेंगे!..


राजभाषा पत्रिका से साभार